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कठोपनिषद्

Katha Upanishad

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कठोपनिषद् (Katha Upanishad) — परिचय

उपनिषद • कृष्ण यजुर्वेद • २ अध्याय • ६ वल्लियाँ

बालक नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के मध्य अमर आत्मा और आत्मज्ञान का अत्यंत रोमांचक संवाद।

कठोपनिषद् में नचिकेता द्वारा यमराज से मांगे गए तीसरे वरदान (मृत्यु के पश्चात आत्मा के अस्तित्व) पर गूढ़ दार्शनिक विवेचन है। श्रेयस (कल्याणकारी) और प्रेयस (सुखकर) का भेद इसी उपनिषद में विशद रूप से समझाया गया है।

प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, मंत्र १४

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥

उठो! जागो! और श्रेष्ठ महापुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो। ज्ञानियों का कहना है कि यह आत्मज्ञान का मार्ग छुरे की तीक्ष्ण धार के समान अत्यंत दुर्गम है।

Arise, awake, and learn by approaching the excellent teachers! The sharp edge of a razor is difficult to cross; thus the wise say the path to spiritual truth is hard.