|कठोपनिषद्
अध्याय 1 • श्लोक 1प्रथमा वल्ली (अध्याय १, वल्ली १)
श्लोक:
अध्याय सार:

वाजश्रवस का सर्वमेध यज्ञ, नचिकेता की पितृभक्ति, यमलोक गमन, यमराज की प्रतीक्षा और प्रथम दो वरदान।

॥ मूल संस्कृत श्लोक ॥
ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ | तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ||
Roman Transliteration (IAST)oṁ uśan ha vai vājaśravasaḥ sarvavedasaṁ dadau | tasya ha naciketā nāma putra āsa ||
सम्पूर्ण हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ
स्वर्गफल की इच्छा से वाजश्रवा के पुत्र उद्दालक ने 'सर्वमेध' यज्ञ में अपना सम्पूर्ण धन दान कर दिया। उनका 'नचिकेता' नाम का एक यशस्वी पुत्र था।
English Translation
“Desirous of heavenly rewards, Vajashravasa gave away all his possessions in a sacrifice. He had a son named Nachiketa.”
परम्परागत आचार्य भाष्य एवं आध्यात्मिक रहस्य

कठोपनिषद् का प्रारम्भ एक बालक की सत्यनिष्ठा और जिज्ञासा से होता है।

श्लोक 1 / 2

कठोपनिषद् — सम्पूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ सहित (Katha Upanishad)

यमराज और बालक नचिकेता के मध्य अमर संवाद। मृत्यु का रहस्य, श्रेयस्-प्रेयस् विवेक, रथ-सारथी रूपक और 'उत्तिष्ठत जाग्रत' का अमर उद्घोष।

The legendary dialogue between the god of Death (Yama) and the young seeker Nachiketa on the mystery of mortality, the eternal soul, and self-realization.

प्रथमा वल्ली (अध्याय १, वल्ली १) (Valli 1: The Sacrifice of Vajasravas)

वाजश्रवस का सर्वमेध यज्ञ, नचिकेता की पितृभक्ति, यमलोक गमन, यमराज की प्रतीक्षा और प्रथम दो वरदान।

श्लोक 1.1

ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ | तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ||

oṁ uśan ha vai vājaśravasaḥ sarvavedasaṁ dadau | tasya ha naciketā nāma putra āsa ||

हिंदी अर्थ: स्वर्गफल की इच्छा से वाजश्रवा के पुत्र उद्दालक ने 'सर्वमेध' यज्ञ में अपना सम्पूर्ण धन दान कर दिया। उनका 'नचिकेता' नाम का एक यशस्वी पुत्र था।

Meaning: Desirous of heavenly rewards, Vajashravasa gave away all his possessions in a sacrifice. He had a son named Nachiketa.

श्लोक 1.20

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके | एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ||

yeyaṁ prete vicikitsā manuṣye'stītyeke nāyamastīti caike | etadvidyāmanuśiṣṭastvayā'haṁ varāṇāmeṣa varastṛtīyaḥ ||

हिंदी अर्थ: नचिकेता ने कहा: मनुष्य के मरने पर यह जो संशय होता है—कोई कहते हैं कि आत्मा रहता है और कोई कहते हैं कि नहीं रहता। आपके द्वारा शिक्षित होकर मैं इस आत्म-तत्व को जानना चाहता हूँ; वरों में यह मेरा तीसरा वर है।

Meaning: Nachiketa said: There is this doubt regarding a deceased person: some say 'he exists', and others say 'he does not exist'. Instructed by you, I would know this. Of all boons, this is the third boon.

द्वितीया वल्ली (अध्याय १, वल्ली २) (Valli 2: Shreyas vs Preyas)

श्रेयस् (कल्याण) और प्रेयस् (प्रिय) का भेद, ॐकार का परम पद, आत्मा की अजरता-अमरता एवं अणु से सूक्ष्म, महान से महान स्वरूप।

श्लोक 2.1

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषꣳ सिनीतः | तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ||

anyacchreyo'nyadutaiva preyaste ubhe nānārthe puruṣaṁ sinītaḥ | tayoḥ śreya ādadānasya sādhu bhavati hīyate'rthādya u preyo vṛṇīte ||

हिंदी अर्थ: यमराज ने कहा: 'श्रेयस्' (परम कल्याण) भिन्न है और 'प्रेयस्' (सांसारिक सुख) भिन्न है। ये दोनों भिन्न-भिन्न प्रयोजन वाले होकर मनुष्य को बांधते हैं। इनमें से श्रेय को ग्रहण करने वाले का कल्याण होता है, और जो प्रेय को चुनता है, वह परम पुरुषार्थ से च्युत हो जाता है।

Meaning: Yama said: The good (Shreyas) is one thing, and the pleasant (Preyas) is quite another. Both bind humans to different ends. Well is it for him who embraces the good, but he who chooses the pleasant misses the true goal of life.

श्लोक 2.18

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् | अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||

na jāyate mriyate vā vipaścinnāyaṁ kutaścinna babhūva kaścit | ajo nityaḥ śāśvato'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||

हिंदी अर्थ: यह ज्ञानस्वरूप आत्मा न कभी जन्म लेता है और न मरता है। यह न किसी से उत्पन्न हुआ है और न कोई इससे उत्पन्न हुआ है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।

Meaning: The knowing Self is never born; nor does It die at any time. It sprang from nothing, and nothing sprang from It. Unborn, eternal, everlasting, primeval, It is not destroyed when the body is destroyed.

तृतीया वल्ली (अध्याय १, वल्ली ३) (Valli 3: The Parable of the Chariot)

शरीर रूपी रथ, आत्मा रूपी रथी, बुद्धि रूपी सारथी, मन रूपी लगाम, इन्द्रिय रूपी घोड़े; 'उत्तिष्ठत जाग्रत' का महाघोष।

श्लोक 3.3

आत्मानꣳ रथिनं विद्धि शरीरꣳ रथमेव तु | बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ||

ātmānaṁ rathinaṁ viddhi śarīraṁ rathameva tu | buddhiṁ tu sārathiṁ viddhi manaḥ pragrahameva ca ||

हिंदी अर्थ: आत्मा को रथी (रथ का स्वामी) जानो और शरीर को रथ समझो; बुद्धि को सारथी (चालक) जानो और मन को लगाम समझो।

Meaning: Know the Self as the lord of the chariot, and the body as the chariot itself. Know the intellect as the charioteer, and the mind as the reins.

श्लोक 3.14

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत | क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ||

uttiṣṭhata jāgrata prāpya varānnibodhata | kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathastatkavayo vadanti ||

हिंदी अर्थ: उठो! जागो! और श्रेष्ठ (महापुरुषों) के समीप जाकर उस आत्म-तत्व को जानो। ज्ञानीजन कहते हैं कि वह मार्ग छुरे की तीक्ष्ण धार के समान दुर्गम और कठिन है।

Meaning: Arise! Awake! Approach the great teachers and realize the Self! The path is sharp as the edge of a razor, hard to tread and difficult to traverse—so the wise say.

चतुर्थी वल्ली (अध्याय २, वल्ली १) (Valli 4: The Inward Vision)

इन्द्रियों का बहिर्मुखी स्वभाव, आत्मदर्शी का अंतर्मुखी होना, जो यहाँ है वही वहाँ है (अद्वैत का सूत्र)।

श्लोक 4.1

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् | कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ||

parāñci khāni vyatṛṇat svayambhūstasmātparāṅpaśyati nāntarātman | kaściddhīraḥ pratyagātmānamaikṣadāvṛttacakṣuramṛtatvamicchan ||

हिंदी अर्थ: स्वयम्भू ब्रह्मा ने इन्द्रियों के द्वारों को बाहर की ओर मुख वाला बनाया, इसलिए मनुष्य बाहर देखता है, अंतरात्मा को नहीं। कोई विरला धैर्यवान पुरुष ही अमरत्व की इच्छा से अपनी दृष्टि को भीतर मोड़कर अंतरात्मा का साक्षात्कार करता है।

Meaning: The Self-existent Creator pierced the senses outward; therefore one looks outward and not inward into the Self. Some rare wise seeker, longing for immortality, turned his eyes inward and beheld the inner Self.

पञ्चमी वल्ली (अध्याय २, वल्ली २) (Valli 5: The City of Eleven Gates)

एकादश द्वारों वाला देह-नगर, सर्वभूतांतरात्मा की एकता, सूर्य सदृश निष्कलंक आत्मा एवं 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्'।

श्लोक 5.15

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः | तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ||

na tatra sūryo bhāti na candratārakaṁ nemā vidyuto bhānti kuto'yamagniḥ | tameva bhāntamanubhāti sarvaṁ tasya bhāsā sarvamidaṁ vibhāti ||

हिंदी अर्थ: वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारे, न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर यह लौकिक अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकती है? उस परमात्मा के प्रकाशित होने पर ही यह सब कुछ प्रकाशित होता है; उसी के प्रकाश से यह सम्पूर्ण संसार आलोकित है।

Meaning: There the sun does not shine, nor the moon and stars, nor do these flashes of lightning shine, much less this earthly fire. Following Him alone as He shines, does everything shine; by His light all this universe is illumined.

षष्ठी वल्ली (अध्याय २, वल्ली ३) (Valli 6: The Eternal Tree and Immortality)

सनातन अश्वत्थ वृक्ष, योग की परिभाषा, मन और इन्द्रियों की स्थिरता, हृदय की समस्त ग्रंथियों का भेदन एवं अमरत्व की प्राप्ति।

श्लोक 6.1

ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः | तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते | तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ||

ūrdhvamūlo'vākśākha eṣo'śvatthaḥ sanātanaḥ | tadeva śukraṁ tad brahma tadevāmṛtamucyate | tasmi~llokāḥ śritāḥ sarve tadu nātyeti kaścana ||

हिंदी अर्थ: ऊपर की ओर मूल वाला और नीचे की ओर शाखाओं वाला यह सनातन अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष है। वही परम शुद्ध है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है। समस्त लोक उसी के आश्रित हैं, कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता।

Meaning: This is that eternal Asvattha tree whose roots are above and branches below. That alone is pure, that is Brahman, that indeed is called the Immortal. In It all the worlds rest, and none can transcend It.

श्लोक 6.14

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः | अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ||

yadā sarve pramucyante kāmā ye'sya hṛdi śritāḥ | atha martyo'mṛto bhavatyatra brahma samaśnute ||

हिंदी अर्थ: जब मनुष्य के हृदय में स्थित सम्पूर्ण कामनाएं छूट जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य इसी जीवन में अमर हो जाता है और यहीं ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है।

Meaning: When all the desires that dwell in the human heart are cast away, then does the mortal become immortal, and here in this very life attains Brahman.