॥ सत्यं वद, धर्मं चर ॥
सम्पूर्ण व्रत एवं पौराणिक कथाएं (Sacred Kathas)
सनातन धर्म की पावन व्रत कथाएं, एकादशी महात्म्य, पूजन विधि एवं फलश्रुति। पढ़ें, सुनें और धर्म मार्ग पर अग्रसर हों।
कथा सूची (5)
भगवान श्री सत्यनारायण (विष्णु)
श्री सत्यनारायण व्रत कथा
कलिकाल में सबसे कल्याणकारी और सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाली भगवान विष्णु की पावन व्रत कथा।
पूर्णिमा, गुरुवार, संक्रांति या शुभ मुहूर्त
भगवान शिव (महादेव)
महाशिवरात्रि व्रत कथा
अज्ञान के अंधकार से मोक्ष के प्रकाश की ओर ले जाने वाली भगवान आशुतोष शिव की पावन कथा।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी
भगवान श्री विष्णु
निर्जला एकादशी व्रत कथा
वर्ष भर की सभी २४ एकादशियों का पुण्य अकेले देने वाली परम तपमयी एकादशी।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
माँ गौरी एवं भगवान शिव
करवा चौथ व्रत कथा
अखंड सौभाग्य, सुहाग की दीर्घायु एवं दांपत्य सुख की पावन पारंपरिक व्रत कथा।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी
भगवान शिव एवं माता पार्वती
सोमवार व्रत कथा
मनोवांछित जीवनसाथी, मानसिक शांति और कष्ट निवारण हेतु भगवान आशुतोष का प्रिय सोमवार व्रत।
प्रत्येक सोमवार / श्रावण सोमवार
भगवान श्री सत्यनारायण (विष्णु)•पूर्णिमा, गुरुवार, संक्रांति या शुभ मुहूर्त
श्री सत्यनारायण व्रत कथा
कलिकाल में सबसे कल्याणकारी और सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाली भगवान विष्णु की पावन व्रत कथा।
व्रत एवं पूजन विधि (Sacred Vidhi & Rituals)
- 1प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर सत्यनारायण व्रत का संकल्प लें।
- 2चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान सत्यनारायण एवं शालिग्राम जी की स्थापना करें।
- 3पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) और पंजीरी (गेहूं का भुना आटा, चीनी, केले व तुलसीदल) का नैवेद्य तैयार करें।
- 4कथा श्रवण के पश्चात आरती करें और सभी भक्तों में चरणामृत व पंजीरी का प्रसाद वितरित करें।
❖प्रथम अध्याय (First Chapter) - कथा की महिमा एवं नारद जी की प्रार्थना
एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अठ्यासी हजार ऋषियों ने परम ज्ञानी सूत जी से पूछा — हे सूत जी महाराज! इस कलयुग में कौन सा ऐसा व्रत अथवा तप है जिससे मानव जाति को सभी कष्टों से मुक्ति मिले और परम शांति व मोक्ष प्राप्त हो?
सूत जी ने कहा — हे मुनियों! एक बार भगवान नारायण के अनन्य भक्त देवर्षि नारद जी ने तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए देखा कि मृत्युलोक के सभी प्राणी अपने पूर्व जन्म के कर्मों के फलवश अनेक प्रकार के कष्टों से पीड़ित हैं।
नारद जी ने करुणावश क्षीरसागर में विराजमान भगवान श्रीमन नारायण से प्रार्थना की — हे प्रभु! मृत्युलोक के प्राणियों के उद्धार का कोई सरल उपाय बताएं। तब भगवान नारायण ने कहा — हे नारद! सत्यनारायण व्रत तीनों लोकों में दुर्लभ और अत्यंत पुण्यप्रद है। जो भी मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में मोक्ष पद प्राप्त करता है।
❖द्वितीय अध्याय (Second Chapter) - निर्धन ब्राह्मण एवं शतानंद जी की कथा
सूत जी ने आगे कहा — प्राचीन काल में काशी नगरी में एक अत्यंत दरिद्र, भिक्षाजीवी ब्राह्मण निवास करता था। उसकी दयनीय दशा देखकर स्वयं भगवान विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर दर्शन दिया।
भगवान ने पूछा — हे विप्रवर! आप इतने दुःखी क्यों हैं? ब्राह्मण ने अपनी निर्धनता व्यक्त की। तब वृद्ध रूपी प्रभु ने कहा — हे ब्राह्मण! भगवान सत्यनारायण का व्रत करो। इससे तुम्हारी समस्त दरिद्रता समाप्त हो जाएगी और जीवन सुखमय हो जाएगा।
ब्राह्मण ने अत्यंत भक्ति से सत्यनारायण व्रत का संकल्प लिया और उसी रात स्वप्न में प्रभु के दर्शन हुए। अगले दिन उसने श्रद्धापूर्वक सपरिवार व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी दरिद्रता नष्ट हो गई और वह परम ऐश्वर्यवान होकर धर्मपूर्वक जीवन बिताने लगा।
❖तृतीय अध्याय (Third Chapter) - साधु वैश्य की कथा
इसके बाद सूत जी ने एक अन्य कथा सुनाई — एक समय उल्कामुख नाम का धर्मात्मा राजा अपनी पत्नी सहित सत्यनारायण का पूजन कर रहा था। वहां एक साधु नामक वैश्य आया और उसने राजा से पूछा — राजन! आप किसका पूजन कर रहे हैं?
राजा ने कहा — मैं संतान और समृद्धि प्रदाता भगवान सत्यनारायण का व्रत कर रहा हूँ। साधु वैश्य ने भी संतान प्राप्ति हेतु व्रत का संकल्प लिया। घर जाकर उसने अपनी पत्नी लीलावती को यह बात बताई। समय आने पर लीलावती ने एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम कलावती रखा गया।
परंतु वैश्य ने कन्या के विवाह तक व्रत टाल दिया। विवाह के समय भी लोभवश व्रत नहीं किया। फलस्वरूप व्यापार के समय राजा चंद्रकेतु के राज्य में साधु वैश्य और उसके दामाद पर चोरी का झूठा आरोप लगा और दोनों कारागार में डाल दिए गए।
❖चतुर्थ अध्याय (Fourth Chapter) - संकट निवारण एवं सत्य की विजय
कारागार में कष्ट भोगते हुए साधु वैश्य को अपने अपराध का स्मरण हुआ। उसने पश्चाताप करते हुए कारागार में ही भगवान सत्यनारायण की मानसिक स्तुति की।
उधर लीलावती और कलावती भी निर्धनता से त्रस्त हो गईं। एक दिन कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण कर घर लौटी। माता-पुत्री ने मिलकर नियमपूर्वक सत्यनारायण का व्रत किया।
प्रभु सत्यनारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि दोनों निर्दोष व्यापारियों को मुक्त करो और उनका धन लौटाओ। राजा ने प्रातः दोनों को मुक्त कर उनका सम्पूर्ण धन दुगुने सम्मान के साथ लौटा दिया।
❖पंचम अध्याय (Fifth Chapter) - राजा तुंगध्वज एवं प्रसाद का महात्म्य
सूत जी ने आगे बताया — एक समय राजा तुंगध्वज वन में शिकार खेलने गए। वहां वट वृक्ष के नीचे कुछ गोप बालक भक्तिभाव से भगवान सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे।
राजा ने अहंकारवश न तो बालकों को प्रणाम किया और न ही दिया गया प्रसाद ग्रहण किया। जब राजा अपने महल लौटा, तो देखा कि उसका राज्य नष्ट हो चुका है और पुत्र भी संकट में हैं।
राजा को अपनी भूल का भान हुआ। वह तुरंत उसी वट वृक्ष के पास लौटा और गोप बालकों के साथ बैठकर विधिवत भगवान सत्यनारायण का पूजन किया और साष्टांग प्रणाम कर प्रसाद ग्रहण किया। प्रभु की कृपा से राजा का राज्य, संपत्ति और पुत्र पुनः सुरक्षित हो गए।
अतः जो भी मनुष्य निष्कपट भाव से इस व्रत को करता है, वह इस संसार में समस्त सुख भोगकर वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।
॥ पावन फलश्रुति (Auspicious Benefits) ॥
सत्यनारायण कथा के श्रवण मात्र से भय, दरिद्रता, रोग और पापों का नाश होता है तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।