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ईशावास्योपनिषद्

Ishavasya Upanishad

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ईशावास्योपनिषद् (Ishavasya Upanishad) — परिचय

उपनिषद • शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि) • १८ मंत्र

समस्त चराचर जगत में ईश्वर की उपस्थिति और त्यागपूर्वक उपभोग का सर्वोच्च वेदान्त सूत्र।

ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है। यह ज्ञान, कर्म और उपासना के समन्वय का अद्वितीय ग्रंथ है। इसका पहला ही श्लोक बताता है कि यह सारा संसार परमात्मा से आच्छादित है, इसलिए किसी के धन का लोभ न करते हुए त्यागभाव से जीवन का आनंद लो।

शांति पाठ एवं प्रथम मंत्र

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥

यह सम्पूर्ण जगत परमात्मा से व्याप्त है। इसलिए त्यागपूर्वक इसका उपभोग करो, किसी के धन की लालसा मत करो।

All this, whatever moves in this moving world, is enveloped by God. Therefore, find your enjoyment in renunciation; do not covet anyone’s wealth.