श्रीमद्भगवद्गीता
Shrimad Bhagavad Gita
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श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagavad Gita) — परिचय
श्रीमद्भगवद्गीता • महर्षि वेदव्यास / भगवान श्री कृष्ण • १८ अध्याय • ७०० श्लोक
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया कर्म, ज्ञान और भक्तियोग का शाश्वत उपदेश।
श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अंश है। यह समस्त उपनिषदों का सार (दधिखंड) है। जीवन की हर दुविधा, कर्तव्य, कर्मण्यता, अनासक्ति और परमात्मा से मिलन के गूढ़ रहस्यों को सरल रूप में उद्घाटित करने वाला यह विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ है।
अध्याय २, श्लोक ४७ - निष्काम कर्मयोग
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल के हेतु मत बनो और न ही अकर्मण्यता में तुम्हारी आसक्ति हो।
You have a right only to work, never to its fruits; let not the fruits of action be your motive, nor let your attachment be to inaction.